UNSC में ‘दोहरे दर्जे’ की सदस्यता मंजूर नहीं; भारत ने स्थायी सीट के साथ वीटो पावर पर भी ठोका दावा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की मांग अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। भारत ने न्यूयॉर्क में चल रही अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) के दौरान स्पष्ट किया है कि वह परिषद में ‘दोयम दर्जे’ की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा। भारत का तर्क है कि बिना वीटो पावर के नए स्थायी सदस्य बनाना न केवल असमानता को बढ़ावा देगा, बल्कि यह सुधार की मूल भावना के भी खिलाफ होगा।

भारत की मुख्य मांग: ‘बराबरी या कुछ नहीं’

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने जोर देकर कहा कि परिषद में वास्तविक सुधार तभी संभव है जब स्थायी सदस्यों की श्रेणी का विस्तार वीटो अधिकारों के साथ किया जाए। भारत ने उन प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें बिना वीटो के स्थायी सीट देने की बात कही गई थी।

भारत के रुख की 3 बड़ी बातें:

  • असमानता का विरोध: भारत का मानना है कि वीटो के बिना नई श्रेणी बनाने से वार्ताएं और जटिल होंगी और वैश्विक संस्था में भेदभाव बना रहेगा।

  • G4 समूह का समर्थन: भारत ने ब्राजील, जर्मनी और जापान (G4) के उस प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिसमें नए सदस्यों के वीटो पावर को केवल 15 साल के लिए टालने (Defer) की बात कही गई है, न कि उसे पूरी तरह खत्म करने की।

  • असंतुलन को ठीक करना: राजदूत हरीश के अनुसार, वर्तमान संरचना में ऐतिहासिक असंतुलन है, जिसे ठीक करने के लिए वीटो अधिकारों का विस्तार जरूरी है।

चीन और पाकिस्तान: राह में खड़े बड़े रोड़े

भारत की इस वैश्विक महाशक्ति बनने की राह में चीन और पाकिस्तान सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।

  1. चीन का रुख: चीन तकनीकी कारणों का हवाला देकर भारत की सदस्यता में अड़ंगा लगाता रहा है। हालांकि, हालिया कूटनीतिक बातचीत में उसने ‘आकांक्षाओं का सम्मान’ करने जैसे गोलमोल शब्दों का इस्तेमाल किया है।

  2. पाकिस्तान का तर्क: पाकिस्तान क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के कारण भारत का विरोध करता है। उसका दावा है कि भारत को स्थायी सीट मिलने से दक्षिण एशिया का ‘क्षेत्रीय संतुलन’ बिगड़ जाएगा।

निष्कर्ष और आगे की राह

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका से समझौता नहीं करेगा। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए P5 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन) की सहमति अनिवार्य है। ऐसे में भारत की अगली चुनौती चीन को भरोसे में लेने और वैश्विक जनमत को अपने पक्ष में और मजबूत करने की होगी।


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