पटना: बिहार की सियासत में एक नए युग की शुरुआत हुई है। भाजपा के कद्दावर नेता सम्राट चौधरी ने बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर इतिहास रच दिया है। उन्होंने न केवल भाजपा को बिहार में पहला मुख्यमंत्री दिया, बल्कि राज्य के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह बदल दिया है।
राजनीतिक विरासत और सफर
सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में हुआ था। राजनीति उन्हें विरासत में मिली है:
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पिता: शकुनी चौधरी, जो सात बार विधायक और सांसद रह चुके हैं।
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माता: पार्वती देवी, जो तारापुर से विधायक रही हैं।
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शुरुआत: उन्होंने 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव की आरजेडी (RJD) से करियर शुरू किया और 1999 में सबसे कम उम्र के कृषि मंत्री बने।
कितनी संपत्ति के मालिक हैं नए CM?
चुनावी हलफनामे के अनुसार, सम्राट चौधरी की कुल नेटवर्थ 11.34 करोड़ रुपये से ज्यादा है। उनकी संपत्ति का मुख्य विवरण इस प्रकार है:
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नकदी और बैंक बैलेंस: परिवार के पास करीब 27 लाख रुपये बैंक में जमा हैं।
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सोना और निवेश: 40 लाख रुपये का सोना और 32 लाख रुपये के शेयर/म्यूचुअल फंड।
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अचल संपत्ति: तारापुर और पटना में 8 करोड़ रुपये से अधिक की कृषि भूमि और 58 लाख की कॉमर्शियल बिल्डिंग।
सम्राट चौधरी और ‘लव-कुश’ समीकरण
भाजपा ने सम्राट चौधरी पर दांव खेलकर नीतीश कुमार के पारंपरिक ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई है। कुशवाहा समुदाय से आने वाले सम्राट ओबीसी वर्ग के एक प्रभावशाली चेहरे हैं। बिहार की राजनीति में इस समुदाय की आबादी और पकड़ चुनाव परिणाम बदलने की क्षमता रखती है।
मुरेठा (पगड़ी) का संकल्प
सम्राट चौधरी पिछले दो वर्षों से अपने सिर पर एक खास ‘मुरेठा’ बांधते थे। उनका संकल्प था कि जब तक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाएंगे, तब तक इसे नहीं उतारेंगे। हालांकि, बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और गठबंधन के नए स्वरूप के बाद उन्होंने इसे उतार दिया।
नीतीश कुमार का ‘मास्टरस्ट्रोक’?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश कुमार का सीएम पद छोड़ना और सम्राट को आगे करना एक सोची-समझी रणनीति है। नीतीश अब खुद को एक रणनीतिकार और ‘किंगमेकर’ की भूमिका में देख रहे हैं, जिससे एनडीए के भीतर सवर्ण, ईबीसी और ओबीसी का संतुलन बना रहे।
