आज जब ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को बंद करने की धमकी देता है, तो कच्चा तेल उबलने लगता है। दुनिया का 20% तेल और गैस इसी तंग रास्ते से गुजरता है। लेकिन यह रणनीति नई नहीं है। 16वीं सदी में पुर्तगाल ने दुनिया को दिखाया था कि बिना जमीन जीते, सिर्फ समुद्री रास्तों पर कब्जा करके कैसे ‘सुपरपावर’ बना जाता है।
वास्कोडिगामा का वो ‘आइडिया’ जिसने व्यापार बदल दिया
1498 में जब वास्कोडिगामा भारत पहुँचा, तो पुर्तगाल की राजधानी लिसबन को एक बात समझ आ गई। भारत के मसालों (काली मिर्च, लौंग, दालचीनी) पर अरब और वेनिस के व्यापारियों का एकाधिकार था। पुर्तगाल ने तय किया कि वे बिचौलियों को खत्म करेंगे।
पुर्तगाल का ‘थ्री-पॉइंट’ प्लान: पुर्तगाल के राजा मैनुअल ने 1505 में तीन मुख्य ‘चोक पॉइंट्स’ पर कब्जे की योजना बनाई:
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अदन (Aden): लाल सागर के मुहाने पर।
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मलक्का (Malacca): चीन और इंडोनेशिया के व्यापार के लिए।
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हॉर्मुज (Hormuz): फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार।
हॉर्मुज: अंगूठी में जड़ा हीरा और भारत के ‘युद्ध के घोड़े’
हॉर्मुज सिर्फ मसालों का रास्ता नहीं था, बल्कि भारत की सैन्य ताकत की लाइफलाइन था। उस दौर में विजयनगर साम्राज्य और बहमनी सल्तनत को अपनी सेना के लिए अरबी और फारसी घोड़ों की जरूरत होती थी।
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विजयनगर का राजा हर साल करीब 13,000 घोड़े यहीं से मंगाता था।
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एक अच्छे घोड़े की कीमत सैकड़ों सोने के सिक्कों में होती थी।
अल्बुकर्क का हमला और ‘कार्तताज़’ का खौफ
1507 में पुर्तगाली जनरल अल्बोंसो द अल्बुकर्क ने हॉर्मुज पर हमला किया। पुर्तगाली तोपें इतनी शक्तिशाली थीं कि उन्होंने स्थानीय बेड़े को तहस-नहस कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ दुनिया का सबसे बड़ा ‘समुद्री प्रोटेक्शन रैकेट’ जिसे कार्तताज़ सिस्टम (Cartaz System) कहा गया।
क्या था कार्तताज़ सिस्टम?
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यह एक तरह का समुद्री पासपोर्ट या लाइसेंस था।
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बिना इसके कोई भी जहाज हिंद महासागर में नहीं चल सकता था।
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नियम न मानने वाले जहाजों को डुबो दिया जाता था और माल जब्त कर लिया जाता था।
पतन: जब ब्रिटेन और ईरान साथ आए
करीब 107 साल तक राज करने के बाद, 1622 में पुर्तगालियों का सूर्यास्त हुआ। सफाविद ईरान के शाह अब्बास ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हाथ मिलाया। अंग्रेजों ने जहाजों से बमबारी की और ईरान की जमीनी फौज ने किले को घेर लिया। 22 अप्रैल 1622 को हॉर्मुज से पुर्तगाली झंडा हमेशा के लिए उतर गया।
आज के दौर में सबक
इतिहास खुद को दोहरा रहा है। पुर्तगालियों ने जो काम ‘कार्तताज़’ से किया था, आज वही लेवरेज देश अपनी भौगोलिक स्थिति से पाना चाहते हैं। भारत आज भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है।
