सविता प्रधान: संघर्ष से सफलता की एक अविश्वसनीय गाथा
समाज में जब भी महिला सशक्तिकरण की बात होती है, तो मध्य प्रदेश की सविता प्रधान का नाम एक मिसाल के तौर पर लिया जाता है। आज वे सिंगरौली नगर निगम में आयुक्त (Commissioner) के पद पर तैनात हैं, लेकिन यहाँ तक पहुँचने का उनका सफर कांटों भरा रहा है।
बचपन का अभाव और 16 की उम्र में शादी
सविता का जन्म नर्मदापुरम के एक छोटे से गांव मड़ई के आदिवासी परिवार में हुआ था। आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि उनके पिता धान कटाई और महुआ बीनकर परिवार पालते थे। महज 16 साल की उम्र में, जब उनके खेलने-पढ़ने के दिन थे, उनकी शादी खुद से 11 साल बड़े व्यक्ति से कर दी गई।
ससुराल की प्रताड़ना और निर्णायक मोड़
शादी के बाद सविता की जिंदगी और कठिन हो गई। ससुराल में उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। पति के साथ-साथ सास-ससुर का व्यवहार भी हिंसक था। लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो उन्होंने अपने दो बच्चों (अथर्व और यजूस) के भविष्य के लिए वह घर छोड़ने का साहसी फैसला लिया।
ब्यूटी पार्लर की नौकरी से अधिकारी बनने तक का सफर
ससुराल छोड़ने के बाद सविता के पास कोई जमापूंजी नहीं थी। उन्होंने एक रिश्तेदार के यहाँ रहकर ब्यूटी पार्लर में काम करना शुरू किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की।
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पहली सफलता: साल 2005 में पहली बार MPPSC पास की और पुलिस सेवा के लिए चुनी गईं।
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लक्ष्य की प्राप्ति: 2006 में दोबारा परीक्षा दी और पूरे प्रदेश में 83वीं रैंक हासिल कर प्रशासनिक अधिकारी बनीं।
सविता का संदेश: “डर को ताकत बनाएं”
सविता प्रधान अक्सर चर्चाओं में रहती हैं क्योंकि कई लोग उन्हें गलती से IAS समझ लेते हैं, जिस पर वे स्पष्ट रूप से कहती हैं कि वे एक PCS अधिकारी हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि इरादे फौलादी हों तो आप अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं।
