रामायण का VFX अवतार: सिनेमा का भविष्य या भावनाओं से खिलवाड़?
निर्देशक नितेश तिवारी की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘रामायण’ का पहला लुक सामने आते ही चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। रणबीर कपूर को भगवान राम के रूप में देखने के बाद जहां एक वर्ग फिल्म की भव्यता की तारीफ कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसके ‘अत्यधिक डिजिटल’ होने पर सवाल उठा रहा है। ₹4000 करोड़ के अनुमानित बजट वाली यह फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए अब तक का सबसे बड़ा जोखिम मानी जा रही है।
दर्शकों के बीच क्यों है असंतोष?
टीजर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है। दर्शकों की मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:
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सिंथेटिक लुक: सुनहरे आसमान और चमकीले लैंडस्केप को कई लोगों ने “वीडियो गेम” जैसा और अवास्तविक बताया है।
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मिट्टी से जुड़ाव की कमी: ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों की सफलता के पीछे उनका धरातल से जुड़ा होना था, जबकि ‘रामायण’ का लुक काफी पॉलिश और कृत्रिम लग रहा है।
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आदिपुरुष से तुलना: फिल्म की तुलना प्रभास की ‘आदिपुरुष’ से की जा रही है, जो खराब VFX के कारण विवादों में रही थी।
क्या कहता है VFX जगत?
फिल्म जगत के विशेषज्ञ इसे भारतीय सिनेमा के लिए एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं।
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DNEG की भूमिका: ऑस्कर विजेता कंपनी DNEG इस फिल्म के विजुअल्स संभाल रही है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की ताकत रखती है।
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AI का उपयोग: विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी स्केल की फिल्म के लिए AI का सहारा लेना मजबूरी और बुद्धिमानी दोनों है, ताकि काम तेजी से और सटीक हो सके।
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कलर और टेक्सचर: कलर ग्रेडिंग एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुरुआती टीजर केवल भव्यता दिखाने के लिए होते हैं, अंतिम फिल्म में वास्तविकता का पुट अधिक हो सकता है।
ग्लोबल ट्रेंड: क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं?
दिलचस्प बात यह है कि जहां भारतीय फिल्में VFX पर निर्भर हो रही हैं, वहीं हॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक जैसे क्रिस्टोफर नोलन (ओपेनहाइमर) और डेनिस विलेनुवे (ड्यून) अब ‘प्रैक्टिकल इफेक्ट्स’ और असली लोकेशंस को प्राथमिकता दे रहे हैं। भारतीय सिनेमा में भी एसएस राजामौली और संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशक सेट और लोकेशंस पर काफी जोर देते हैं ताकि विजुअल्स ‘असली’ लगें।
निष्कर्ष: अंततः ‘रामायण’ की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि उसमें कितनी तकनीक का इस्तेमाल हुआ है, बल्कि इस पर करेगी कि वह दर्शकों के दिलों को कितना छू पाती है। तकनीक कहानी कहने का जरिया होनी चाहिए, खुद कहानी नहीं।
