इस्लाम में मक्का स्थित काबा को दुनिया की पहली इबादतगाह माना गया है। इसकी नींव कब रखी गई, यह तो इतिहास के पन्नों में स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसकी भव्यता और इसके पत्थरों ने सदियों का इतिहास बनते और बिगड़ते देखा है।
हजरत इब्राहिम और काबा का निर्माण
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 4000 साल पहले अल्लाह के हुक्म से पैगंबर इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल ने इस पवित्र इमारत का निर्माण किया था। इस्माइल पहाड़ों से पत्थर लाते और इब्राहिम दीवारें चुनते।
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हजरे अस्वद: जब एक पत्थर कम पड़ा, तो फरिश्ते जिब्राइल जन्नत से एक पत्थर लाए, जिसे ‘हजरे अस्वद’ कहा जाता है। इसे काबा के पूर्वी कोने में लगाया गया।
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आबे-ज़मज़म का करिश्मा: रेगिस्तान की तपती घाटी में जब नन्हे इस्माइल प्यास से तड़प रहे थे, तब उनके पैरों की थाप या फरिश्ते के इशारे से पानी का एक सोता फूटा, जिसे आज पूरी दुनिया आबे-ज़मज़म के नाम से जानती है।
ऐतिहासिक चुनौतियाँ और पुनर्निर्माण
काबा का इतिहास केवल इबादत का नहीं, बल्कि संघर्षों का भी रहा है:
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बाढ़ और आग: समय-समय पर पहाड़ों से आई बाढ़ और आग ने इसे नुकसान पहुंचाया। 1629 की भीषण बाढ़ के बाद उस्मानी सुल्तान मुराद चतुर्थ ने इसे ग्रेनाइट के पत्थरों से और भी मजबूत बनवाया।
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अब्रहा का हमला (570 ईस्वी): हाथियों की सेना लेकर आए अब्रहा को नन्हे अबाबील पक्षियों ने कंकड़ मारकर हरा दिया था।
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हजरे अस्वद की चोरी (930 ईस्वी): करामती संप्रदाय ने इस पवित्र पत्थर को निकाल लिया था, जो 22 साल बाद वापस मिला।
काबा की वर्तमान वास्तुकला और आधुनिक सुविधाएं
आज का काबा एक घनाकार (Cube) इमारत है, जिसकी ऊंचाई लगभग 13.1 मीटर है। इसके चारों कोनों के विशिष्ट नाम हैं: रुकने अस्वद, रुकने शमी, रुकने इराकी और रुकने यमनी।
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किस्वह (Kiswa): काबा को ढकने वाले रेशमी काले कपड़े को ‘किस्वह’ कहते हैं, जिस पर सोने और चांदी के तारों से कुरान की आयतें लिखी होती हैं।
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मसा (Masa): सफा और मरवा पहाड़ियों के बीच की दौड़ (सई), जो कभी कठिन थी, आज पूरी तरह से एयर-कंडीशंड है और आधुनिक सुविधाओं से लैस है।
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निष्कर्ष: आस्था का अटूट केंद्र
सत्ता बदली, कबीले आए और गए, लेकिन काबा आज भी दुनिया भर के करोड़ों मुसलमानों के लिए एकता और इबादत का सबसे बड़ा मरकज (केंद्र) बना हुआ है। यह इमारत हमें हजरत इब्राहिम के त्याग और अल्लाह के प्रति उनके अटूट विश्वास की याद दिलाती है।
