संसद में आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए परिसीमन विधेयक-2026 (Delimitation Bill) पेश किया गया। इस बिल का सीधा असर देश के लोकतांत्रिक ढांचे और भविष्य में होने वाले चुनावों पर पड़ेगा। सरकार के इस कदम से न केवल लोकसभा सीटों की संख्या में भारी इजाफा होगा, बल्कि महिला आरक्षण को लागू करने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
परिसीमन क्या है और अब इसकी जरूरत क्यों?
साधारण शब्दों में कहें तो, बढ़ती जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों (Constituencies) की सीमाओं को फिर से तय करने की प्रक्रिया को परिसीमन कहते हैं।
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पुरानी व्यवस्था: वर्तमान में लोकसभा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना पर आधारित है।
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बदलाव की वजह: पिछले 50 सालों में देश की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है, जिससे एक सांसद पर जनता का बोझ बढ़ गया है।
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नया लक्ष्य: हर क्षेत्र में जनसंख्या का समान संतुलन बनाना ताकि प्रतिनिधित्व सटीक हो सके।
लोकसभा की बदल जाएगी तस्वीर: 850 सीटों का गणित
नए विधेयक के अनुसार, सीटों के फ्रीज होने की अवधि (जो 2026 तक थी) को हटाकर नई जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा।
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राज्यों के लिए सीटें: लोकसभा में राज्यों की अधिकतम सीटें 815 तक हो सकती हैं।
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केंद्र शासित प्रदेश: केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें आरक्षित की जा सकती हैं।
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कुल योग: इस तरह सदन की कुल क्षमता 850 तक पहुँचने का अनुमान है।
बिल की 5 बड़ी बातें (Key Highlights)
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महिला आरक्षण: सीटों के विस्तार के बाद ही संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलना संभव हो पाएगा।
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परिसीमन आयोग: एक स्वतंत्र आयोग बनेगा जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड या कार्यरत जज करेंगे।
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जनसंख्या आधार: ‘नवीनतम प्रकाशित जनगणना’ के आंकड़ों को आधार बनाकर ही सीमाओं का पुनर्निर्धारण होगा।
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राज्यों की हिस्सेदारी: माना जा रहा है कि उत्तर भारत के राज्यों में सीटों की संख्या में 50% तक की बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
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पारदर्शिता: आयोग अपने प्रस्तावों पर जनता से सुझाव और आपत्तियां भी लेगा।
विवाद और विरोध का मुख्य कारण
विपक्ष इस बिल की टाइमिंग और जल्दबाजी पर सवाल उठा रहा है। मुख्य चिंता यह है कि 2001 और 2003 के संशोधनों के तहत सीटों का निर्धारण 2026 तक रोक दिया गया था। अब सरकार संशोधन लाकर इसे पहले ही लागू करना चाहती है, जिसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
