देश की सर्वोच्च अदालत ने अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा कदम उठाया है। सोमवार (6 अप्रैल, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को निर्देश दिया कि वह मुख्यमंत्री पेमा खांडू और उनके परिवार के सदस्यों को दिए गए ₹1,270 करोड़ के सार्वजनिक अनुबंधों (Public Contracts) की प्रारंभिक जांच शुरू करे।
यह मामला भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से जुड़ा है।
क्या हैं मुख्य आरोप?
गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ‘वॉलंटरी अरुणाचल सेना’ और ‘सेव मोन रीजन फेडरेशन’ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर गंभीर आरोप लगाए थे:
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विशाल राशि: जनवरी 2015 से दिसंबर 2025 के बीच करीब ₹1,270 करोड़ के टेंडर दिए गए।
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हितों का टकराव (Conflict of Interest): आरोप है कि टेंडर सीएम खांडू, उनके भाई त्सेरिंग ताशी और सौतेली माँ रिंचिन ड्रेमा से संबंधित फर्मों को दिए गए।
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पारदर्शिता का अभाव: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि खुली टेंडर प्रणाली (Open Tender) को दरकिनार कर अपनों को फायदा पहुँचाया गया।
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित आदेश दिए हैं:
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स्वतंत्र जांच: CBI दो सप्ताह के भीतर जांच शुरू करेगी और 16 सप्ताह में स्टेटस रिपोर्ट पेश करेगी।
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दायरा: जांच 2015 से 2025 तक के कार्य आदेशों तक सीमित नहीं रहेगी; जरूरत पड़ने पर CBI पुराने रिकॉर्ड्स भी खंगाल सकती है।
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राज्य सरकार का सहयोग: कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा है, जो CBI को सभी फाइलें, बैंक वाउचर और ई-प्रोक्योरमेंट डेटा उपलब्ध कराएगा।
“इस प्रारंभिक जांच का उद्देश्य केवल आरोपों की सत्यता का पता लगाना है। इसे मामले के गुण-दोष पर अदालत की टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।” — सुप्रीम कोर्ट
राजनीतिक सरगर्मी तेज
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ के नारे पर तंज कसते हुए इसे एक ‘बड़ा धोखा’ करार दिया है। वहीं, राज्य प्रशासन को अब 4 हफ्तों के भीतर सभी प्रशासनिक मंजूरियों और तकनीकी स्वीकृतियों के दस्तावेज CBI को सौंपने होंगे।
