नई दिल्ली/सिलिकॉन वैली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) न केवल हमारे काम करने के तरीके को बदल रहा है, बल्कि यह जल्द ही दुनिया की अर्थव्यवस्था और टैक्स सिस्टम को भी जड़ से बदल सकता है। OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन और मशहूर निवेशक विनोद खोसला एक ऐसे भविष्य की कल्पना कर रहे हैं जहाँ अधिकांश अमेरिकियों (और संभावित रूप से दुनिया के अन्य देशों) को इनकम टैक्स देने की जरूरत नहीं होगी।
क्या है ‘सुपरइंटेलिजेंस’ के दौर का नया टैक्स प्लान?
हाल ही में OpenAI ने एक 13 पन्नों का पॉलिसी पेपर जारी किया है, जिसका नाम है ‘Industrial Policy for the Intelligence Age’। इसमें सुझाव दिया गया है कि जैसे-जैसे AI इंसानों से ज्यादा स्मार्ट (Superintelligence) होता जाएगा, वर्तमान टैक्स ढांचा पूरी तरह फेल हो सकता है।
योजना के मुख्य बिंदु:
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इनकम टैक्स से राहत: विनोद खोसला का प्रस्ताव है कि $100,000 (करीब ₹84 लाख) से कम कमाने वालों पर से फेडरल इनकम टैक्स पूरी तरह हटा दिया जाए।
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लेबर नहीं, कैपिटल पर टैक्स: अब तक टैक्स लोगों की सैलरी (Labor) पर आधारित होता है। नया प्रस्ताव कहता है कि टैक्स कंपनियों के मुनाफे और ‘कैपिटल गेन्स’ पर लगाया जाना चाहिए।
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रोबोट टैक्स: ऑटोमेशन के जरिए जो कंपनियां भारी मुनाफा कमाएंगी, उन पर ‘रोबोट टैक्स’ लगाने का विचार है।
‘पब्लिक वेल्थ फंड’: सबको मिलेगा AI की कमाई का हिस्सा?
OpenAI के ब्लूप्रिंट में सबसे चौंकाने वाला सुझाव ‘नेशनल वेल्थ फंड’ का है।
“यह एक ऐसा सरकारी फंड होगा जिसमें AI कंपनियां अपना हिस्सा देंगी। इस फंड से होने वाली कमाई को सीधे नागरिकों में बांटा जाएगा, ताकि AI के कारण जिनकी नौकरियां प्रभावित हों, उन्हें वित्तीय सुरक्षा मिल सके।”
क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत?
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नौकरियों पर खतरा: विनोद खोसला का अनुमान है कि 2030 तक AI करीब 80% मौजूदा नौकरियों को ऑटोमेट कर सकता है।
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राजस्व का संकट: अगर लोग नौकरी नहीं करेंगे, तो सरकार को इनकम टैक्स और पेरोल टैक्स नहीं मिलेगा। इससे सोशल सिक्योरिटी और हेल्थकेयर जैसी सुविधाएं ठप हो सकती हैं।
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अत्यधिक संपन्नता (Extreme Abundance): विशेषज्ञों का मानना है कि AI उत्पादन की लागत को इतना कम कर देगा कि दक्षता (Efficiency) से ज्यादा ध्यान संसाधनों के समान वितरण पर देना होगा।
चुनौतियां और आलोचना
हालांकि यह योजना सुनने में भविष्यवादी लगती है, लेकिन आलोचक इसे ‘रेगुलेटरी निहिलिज्म’ कह रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यह बड़ी टेक कंपनियों द्वारा रेगुलेशन से बचने के लिए एक दिखावा भी हो सकता है। साथ ही, पूंजी पर टैक्स बढ़ाने से बड़े निवेशकों के देश छोड़ने का खतरा भी बना रहता है, जैसा कि फिलहाल कैलिफोर्निया में देखा जा रहा है।
