धार्मिकसबरीमाला मामला: 'कोई महिला अछूत नहीं', सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सबरीमाला मामला: ‘कोई महिला अछूत नहीं’, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर देश के केंद्र में है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि आस्था के नाम पर किसी भी महिला को ‘अछूत’ नहीं माना जा सकता।

यह सुनवाई केवल एक मंदिर की परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के बीच के संतुलन की एक बड़ी परीक्षा है।

“3 दिन के लिए अछूत नहीं मानी जा सकती महिला” – सुप्रीम कोर्ट

मंगलवार को सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने जैविक आधार पर किए जाने वाले भेदभाव पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट की मुख्य बातें:

  • अछूत प्रथा का विरोध: कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म (Menstruation) के आधार पर किसी महिला को अछूत मानना गरिमा के खिलाफ है।

  • संवैधानिक नैतिकता: अदालत ने संकेत दिया कि धार्मिक परंपराएं संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के ऊपर नहीं हो सकतीं।

  • व्यापक असर: इस फैसले का प्रभाव केवल सबरीमाला पर ही नहीं, बल्कि हाजी अली दरगाह और पारसी अग्नि मंदिरों जैसे अन्य धार्मिक स्थलों पर भी पड़ेगा।

केंद्र सरकार का पक्ष: ‘आस्था के मामले कोर्ट तय न करे’

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले को बदलने की वकालत की। केंद्र की मुख्य दलीलें निम्नलिखित थीं:

  1. परंपरा की बहाली: केंद्र ने मांग की कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को फिर से लागू किया जाए।

  2. नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्वरूप: भगवान अयप्पा के ‘ब्रह्मचारी’ स्वरूप की रक्षा के लिए सदियों पुरानी परंपरा को जरूरी बताया गया।

  3. न्यायिक संयम: सरकार का मानना है कि आस्था से जुड़े संवेदनशील विषयों में अदालतों को दखल देने से बचना चाहिए।


सबरीमाला विवाद की पूरी टाइमलाइन (2018-2026)

यह विवाद साल 2018 के उस फैसले से शुरू हुआ जिसने मंदिर के दरवाजे सभी महिलाओं के लिए खोल दिए थे।

  • सितंबर 2018: 5 जजों की बेंच ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को ‘असंवैधानिक’ करार दिया।

  • जनवरी 2019: बिंदु अमिनी और कनकदुर्गा नामक दो महिलाओं ने कड़ी सुरक्षा के बीच मंदिर में दर्शन किए, जिससे देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए।

  • अप्रैल 2026: अब 9 जजों की बेंच इस मामले की संवैधानिक वैधता और पुनर्विचार याचिकाओं पर अंतिम फैसला लेगी।


प्रो टिप: ‘पॉजीशन जीरो’ के लिए जानकारी

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में ‘संवैधानिक नैतिकता’ (Constitutional Morality) के सिद्धांत का उपयोग कर रहा है। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो ध्यान दें कि यह सिद्धांत व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामूहिक धार्मिक प्रथाओं पर प्राथमिकता देता है।


मुख्य निष्कर्ष: समानता बनाम परंपरा

सबरीमाला केस अब केवल प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है। यह इस सवाल का जवाब देगा कि क्या धार्मिक स्वायत्तता (Religious Autonomy) किसी नागरिक के समानता के अधिकार को सीमित कर सकती है या नहीं।

Key Terms: सबरीमाला मंदिर, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई, CJI सूर्यकांत, अनुच्छेद 14, भगवान अयप्पा, महिला अधिकार।

विशेष जानकारी: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे किसी भी धार्मिक आधार पर भेदभाव का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।

RELATED ARTICLES

회신을 남겨주세요

귀하의 의견을 입력하십시오!
여기에 이름을 입력하십시오.

Most Popular

Recent Comments