पुणे में पिछले तीन-चार दिनों से हो रही बेमौसम बारिश और भीषण ओलावृष्टि ने अन्नदाता के सपनों को बेरहमी से कुचल दिया है। जिले में जैविक खेती (Organic Farming) के जरिए तरबूज उगाने वाले किसानों को इस प्राकृतिक आपदा ने लाखों का घाटा दिया है। सबसे ज्यादा मार उन किसानों पर पड़ी है जिनकी फसल कटने के लिए पूरी तरह तैयार थी।
25 लाख की उम्मीद, अब लागत निकलना भी मुश्किल
पुणे के रहने वाले नितीन गायकवाड़ और उनकी पत्नी रूपाली गायकवाड़ पिछले 8 वर्षों से तरबूज की खेती कर रहे हैं। इस साल उन्होंने अपनी 5 एकड़ जमीन पर पूरी तरह जैविक पद्धति से तरबूज उगाए थे।
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अनुमानित पैदावार: 100 टन
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अनुमानित आय: 20 से 25 लाख रुपये
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वर्तमान स्थिति: ओलों की मार से महज 6 से 7 टन उत्पादन की ही संभावना बची है।
केमिकल फ्री खेती पर फिरा पानी
गायकवाड़ परिवार की खासियत उनकी 100% केमिकल-फ्री खेती है। वे खाद और दवाओं के लिए दूध, बेसन, गुड़, गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल करते हैं। उनके तरबूज इतने शुद्ध और स्वादिष्ट होते थे कि ग्राहक सीधे खेत पर आकर खरीदारी करते थे। जैविक होने के कारण ये तरबूज महीने भर तक खराब नहीं होते थे, लेकिन ओलों ने इन्हें बीच से फाड़ दिया है, जिससे अब ये बाजार में बेचने लायक नहीं बचे।
किसान की अपील: “सब मिट्टी में मिल गया”
भावुक होकर रूपाली गायकवाड़ कहती हैं कि दिन-रात की मेहनत और घरेलू सपनों पर पानी फिर गया है। किसान नितिन गायकवाड़ ने बताया कि इस सीजन में करीब 5 लाख रुपये की लागत आई थी। अब हालत ऐसी है कि लागत का पैसा वापस मिल जाए, तो भी बड़ी बात होगी। पीड़ित परिवार ने अब सरकार से मुआवजे की गुहार लगाई है ताकि वे अगली फसल के लिए खुद को खड़ा कर सकें।
