कश्मीर की वादियों पर बनी फिल्में अक्सर अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं, लेकिन नेटफ्लिक्स पर हाल ही में आई ‘बारामूला’ (Baramulla) इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है। ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ के निर्माता आदित्य धर और निर्देशक आदित्य सुहास जांभले की यह फिल्म एक ऐसी अलौकिक (supernatural) दुनिया में ले जाती है, जहाँ डर का आधार केवल साये नहीं, बल्कि इतिहास के काले पन्ने हैं।
कहानी: रहस्य, रोमांच और रूहानी साये
फिल्म की शुरुआत बारामूला में बच्चों के रहस्यमयी तरीके से गायब होने से होती है। डीएसपी रिजवान सैयद (मानव कौल) इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। वे एक ऐसे विला में रहने जाते हैं जो कभी ‘सप्रू’ परिवार का हुआ करता था। जैसे-जैसे रिजवान उग्रवाद और बच्चों के गायब होने के बीच के तार जोड़ते हैं, वैसे-वैसे उनके घर में कुछ ऐसी घटनाएं होने लगती हैं जिन्हें विज्ञान नहीं समझा सकता।
फिल्म के मुख्य आकर्षण (Key Highlights)
-
सटीक अभिनय: मानव कौल ने एक संशयवादी पुलिस अधिकारी से लेकर अलौकिक शक्तियों का सामना करने वाले इंसान तक का सफर बेहद शालीनता से तय किया है। भाषा सुंबली ने उनकी पत्नी के रूप में बेहतरीन भावनात्मक प्रदर्शन किया है।
-
सिनेमैटोग्राफी: सौरभ गोस्वामी ने कश्मीर को ‘खूबसूरत’ के बजाय ‘अकेला’ और ‘ठंडा’ दिखाया है, जो फिल्म के मिजाज के साथ पूरी तरह मेल खाता है।
-
गहरा संदेश: यह फिल्म महज ‘जंप-स्केयर्स’ पर आधारित नहीं है। यह 1990 के दशक के कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनके सामूहिक दर्द (Collective Trauma) को हॉरर के जरिए पर्दे पर उतारती है।
क्या कमियां रह गईं?
फिल्म की गति (Pacing) काफी धीमी है। पहले एक घंटे में कहानी बहुत धीरे आगे बढ़ती है, जो शायद तेज-तर्रार थ्रिलर पसंद करने वाले दर्शकों को निराश कर सकती है। साथ ही, राजनीति और भूतिया तत्वों का मेल कुछ दर्शकों के लिए समझने में थोड़ा जटिल हो सकता है।
हमारा फैसला: देखें या नहीं?
रेटिंग: 3.5/5
‘बारामूला’ उन लोगों के लिए एक बेहतरीन फिल्म है जो गंभीर सिनेमा पसंद करते हैं। यह डराती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है। अगर आप केवल मनोरंजन के लिए हॉरर फिल्म देखना चाहते हैं, तो यह आपको भारी लग सकती है, लेकिन अगर आप अर्थपूर्ण सिनेमा के शौकीन हैं, तो इसे मिस न करें।
