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अलविदा ‘लद्दाख का शेर’: कारगिल में पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ाने वाले महावीर चक्र विजेता कर्नल सोनम वांगचुक का निधन।

लद्दाख की बर्फीली वादियों में शुक्रवार की सुबह एक युग का अंत हो गया। कारगिल युद्ध के दौरान अपनी वीरता से पाकिस्तान के दांत खट्टे करने वाले कर्नल (सेवानिवृत्त) सोनम वांगचुक अब हमारे बीच नहीं रहे। लेह में दिल का दौरा पड़ने से 61 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उन्हें पूरे देश में ‘लद्दाख का शेर’ (Lion of Ladakh) के नाम से जाना जाता था।

कर्नल वांगचुक के जीवन की बड़ी बातें:

  • जन्म: 11 मई 1964, लेह (लद्दाख)।

  • शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक।

  • सम्मान: महावीर चक्र (देश का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार)।

  • प्रमुख मिशन: कारगिल युद्ध के दौरान छोरबत ला चोटी पर कब्जा।


कारगिल का वो मिशन, जिसने इतिहास बदल दिया

साल 1999 में जब कारगिल की चोटियों पर युद्ध चरम पर था, तब 30 मई को मेजर (तत्कालीन) सोनम वांगचुक को एक लगभग असंभव मिशन सौंपा गया। उन्हें बटालिक सेक्टर में 16,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित छोरबत ला चोटी को दुश्मनों के चंगुल से छुड़ाना था।

वहां ऑक्सीजन की भारी कमी थी और हड्डियां गला देने वाली ठंड, लेकिन वांगचुक का हौसला हिमालय से भी ऊंचा था। उनके नेतृत्व में 30 जवानों की टुकड़ी ने दुश्मन पर ऐसा घातक प्रहार किया कि पाकिस्तानी घुसपैठियों के पांव उखड़ गए। इस मिशन में उन्होंने न केवल चोटी पर तिरंगा फहराया, बल्कि 10 दुश्मन सैनिकों को भी ढेर किया।


एक सच्चा नेतृत्व: जो ‘पीछे’ नहीं ‘आगे’ रहकर लड़ता था

कर्नल वांगचुक सिर्फ एक जांबाज फौजी ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन लीडर भी थे। सेना के गलियारों में उनकी सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की मिसालें दी जाती हैं। 2018 में रिटायर होने के बाद भी वे युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहे।

देश के दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। पूर्व थलसेना अध्यक्ष वीपी मलिक ने उन्हें याद करते हुए कहा कि कर्नल वांगचुक की बहादुरी आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक की तरह काम करेगी।


विरासत जो हमेशा जिंदा रहेगी

कर्नल सोनम वांगचुक का जाना भारतीय सेना और लद्दाख के लिए एक अपूरणीय क्षति है। लेकिन कारगिल की पहाड़ियों में आज भी उनकी वीरता की गूंज सुनाई देती है। उन्होंने सिखाया कि संसाधनों की कमी से युद्ध नहीं हारे जाते, युद्ध जीते जाते हैं तो केवल फौलादी जिगर से।

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