बेंगलुरु: भारत के वन्यजीव इतिहास में शनिवार का दिन एक स्वर्णिम अध्याय की तरह जुड़ गया। करीब सात दशक के लंबे इंतजार के बाद कर्नाटक की धरती पर एक बार फिर दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले जानवर यानी चीते के कदम पड़े हैं। ‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत दक्षिण अफ्रीका से दो नर और दो मादा चीतों की खेप को विशेष विमान के जरिए बेंगलुरु लाया गया है।
क्वारंटाइन और सुरक्षा के कड़े इंतजाम बेंगलुरु पहुंचे इन चार मेहमानों को सीधे बनरघट्टा जैविक उद्यान (Bannerghatta Biological Park) ले जाया गया है। कर्नाटक के वन मंत्री ईश्वर बी. खांड्रे ने बताया कि इन चीतों की सुरक्षा और स्वास्थ्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
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30 दिनों का आइसोलेशन: नए माहौल और मौसम में ढलने के लिए चीतों को पहले एक महीने तक क्वारंटाइन में रखा जाएगा।
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विशेष डाइट: पशु चिकित्सकों की एक टीम इनके आहार और किसी भी संभावित संक्रमण की बारीकी से निगरानी कर रही है।
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निगरानी: दक्षिण अफ्रीका से बेंगलुरु तक के सफर के दौरान भी विशेषज्ञों की टीम इनके साथ मौजूद रही।
कर्नाटक और चीतों का पुराना नाता यह सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक वापसी है। वन मंत्री के अनुसार, आजादी से पहले कर्नाटक के जंगलों में चीतों की अच्छी मौजूदगी थी, लेकिन शिकार और आवास की कमी के कारण वे धीरे-धीरे विलुप्त हो गए। अब 70 साल बाद नई पीढ़ी को अपने राज्य में इन शानदार जीवों को देखने का मौका मिलेगा।
प्रोजेक्ट चीता: अब तक का सफर भारत सरकार ने साल 2022 में लुप्त हो चुके एशियाई चीतों की कमी को पूरा करने के लिए अफ्रीकी चीतों को लाने की योजना शुरू की थी।
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शुरुआत: सितंबर 2022 में नामीबिया से 8 चीते मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क लाए गए थे।
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ताजा आंकड़े: हाल ही में कूनो में जन्मे 4 शावकों के साथ भारत में अब चीतों की कुल संख्या 57 हो गई है।
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विस्तार: कूनो के बाद अब कर्नाटक और मध्य प्रदेश के ही नौरादेही अभयारण्य को चीतों के लिए तैयार किया जा रहा है।
निष्कर्ष भारत में 1952 में चीतों को आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित किया गया था। अब दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना जैसे देशों के सहयोग से भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बनने की ओर अग्रसर है, जिसने एक बड़े मांसाहारी जीव को दूसरे महाद्वीप से लाकर सफलतापूर्वक बसाया है।
