कानपुर का चर्चित किडनी ट्रांसप्लांट कांड अब एक बड़े संगठित अपराध की ओर इशारा कर रहा है। पुलिस जांच में यह साफ हो गया है कि यह केवल एक अवैध सर्जरी नहीं थी, बल्कि तकनीकी रूप से प्रशिक्षित एक शातिर नेटवर्क का काम था। बेगूसराय के एमबीए छात्र आयुष की किडनी निकालने के मामले में डिजिटल साक्ष्यों ने आरोपियों की घेराबंदी तेज कर दी है।
85 मिनट की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और CCTV फुटेज
पुलिस को अस्पताल के जो सीसीटीवी (CCTV) फुटेज मिले हैं, वे हैरान करने वाले हैं। जांच में सामने आया कि एमबीए छात्र आयुष के शरीर से किडनी निकालने की पूरी प्रक्रिया को महज 85 मिनट में पूरा कर लिया गया।
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अनुभवी टीम: इतनी कम अवधि में जटिल ऑपरेशन करना यह दर्शाता है कि ओटी मैनेजर और टेक्नीशियनों की यह टीम इस काम में पहले से बहुत अनुभवी थी।
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सुनियोजित साजिश: यह कोई अचानक की गई सर्जरी नहीं थी, बल्कि इसके लिए अस्पताल के भीतर एक पूरा इकोसिस्टम तैयार किया गया था।
पकड़े जाने से बचने के लिए ‘एयरप्लेन मोड’ का सहारा
आरोपियों ने कानून और पुलिस की सर्विलांस टीम को चकमा देने के लिए डिजिटल चालाकी का इस्तेमाल किया।
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लोकेशन छिपाने की कोशिश: डॉक्टर और उनकी टीम ने ऑपरेशन के दौरान अपने मोबाइल फोन ‘एयरप्लेन मोड’ पर डाल दिए थे ताकि कोई कॉल रिकॉर्ड या टावर लोकेशन न मिल सके।
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अस्पताल के वाई-फाई का इस्तेमाल: आपस में तालमेल बिठाने के लिए उन्होंने मोबाइल नेटवर्क के बजाय अस्पताल के वाई-फाई का उपयोग किया।
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WhatsApp का जाल: सारी गुप्त बातचीत और निर्देश व्हाट्सएप के जरिए दिए गए, ताकि सामान्य कॉल ट्रेसिंग से बचा जा सके।
पुलिस के हाथ लगे मजबूत डिजिटल सबूत
कानपुर पुलिस की सर्विलांस टीम ने इस हाई-टेक चालाकी को डिकोड कर लिया है। जांच में डॉ. रोहित और उनकी टीम के खिलाफ निम्नलिखित पुख्ता सबूत मिले हैं:
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चैट रिकॉर्ड्स: व्हाट्सएप पर हुई संदिग्ध बातचीत के बैकअप।
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नेटवर्क लॉग्स: अस्पताल के वाई-फाई सर्वर से मिला आरोपियों का डेटा।
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सीसीटीवी फुटेज: ऑपरेशन थिएटर के आसपास संदिग्ध गतिविधियां।
जांच का दायरा: पुलिस को अंदेशा है कि इस गिरोह के तार उत्तर प्रदेश के बाहर अन्य राज्यों से भी जुड़े हो सकते हैं। फिलहाल आरोपियों से पूछताछ जारी है ताकि इस तस्करी नेटवर्क की पूरी चेन का पर्दाफाश किया जा सके।
