कल्पक्कम (तमिलनाडु) में भारत ने न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसके लिए दुनिया के अमीर देश दशकों से संघर्ष कर रहे थे। ‘फास्ट ब्रीडर रिएक्टर’ (FBR) की सफलता के साथ ही भारत अब परमाणु ऊर्जा के स्टेज-2 में प्रवेश कर चुका है।
होमी जहांगीर भाभा का सपना हुआ सच
आज से 70 साल पहले भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने एक तीन-चरणीय (Three-stage) परमाणु कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की थी। कल्पक्कम का यह रिएक्टर उसी सपने को धरातल पर उतारने की दिशा में सबसे बड़ी जीत है। इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि इसमें पारंपरिक यूरेनियम के बजाय थोरियम का इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्यों है यह ‘अलादीन का चिराग’?
भारत के पास दुनिया के कुल थोरियम भंडार का लगभग 25% हिस्सा मौजूद है। थोरियम को सीधे ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, लेकिन फास्ट ब्रीडर रिएक्टर इसे जलाकर यूरेनियम-233 में बदल देता है, जो बिजली पैदा करता है।
भारत के लिए इसके फायदे:
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700 साल की सुरक्षा: वर्तमान खपत के अनुसार, भारत का थोरियम भंडार देश को अगले 700 वर्षों तक बिजली दे सकता है।
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आयात पर निर्भरता खत्म: भारत में यूरेनियम बहुत कम है, जिसके लिए हमें रूस और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहना पड़ता है। थोरियम हमें ‘आत्मनिर्भर’ बनाएगा।
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सस्ता और स्वदेशी: जहां अमीर देशों ने इस तकनीक पर 4 लाख करोड़ रुपये गंवा दिए, वहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे महज ₹7,700 करोड़ (90 करोड़ डॉलर) में कर दिखाया।
दुनिया के लिए चुनौती, भारत के लिए अवसर
अमेरिका, जापान और फ्रांस जैसे देशों ने इस तकनीक पर अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन सोडियम कूलेंट के रिसाव और तकनीकी जटिलताओं के कारण वे पीछे हट गए। वर्तमान में केवल रूस, चीन और भारत ही इस दौड़ में सबसे आगे हैं। भारत ने 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप विकसित कर खुद को इस ‘गेम’ का असली खिलाड़ी साबित कर दिया है।
आगे क्या होगा?
अब भारत ‘स्टेज-3’ की ओर कदम बढ़ाएगा, जहां थोरियम आधारित रिएक्टर्स का बड़े पैमाने पर कमर्शियल इस्तेमाल होगा। यह न केवल सस्ती बिजली देगा, बल्कि कार्बन-मुक्त भविष्य की ओर भारत के संकल्प को भी मजबूत करेगा।
