इंसानी इतिहास में एक ऐसा पल आने वाला है जब चार अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से उतनी दूर होंगे, जितना पहले कभी कोई नहीं गया। नासा (NASA) का आर्टेमिस II मिशन चंद्रमा की ओर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इस रोमांचक सफर में एक ऐसा समय आएगा जब मिशन कंट्रोल का ‘भरोसेमंद शोर’ अचानक शांत हो जाएगा।
40 मिनट का पूर्ण सन्नाटा सोमवार रात (भारतीय समयानुसार देर रात) जब ओरियन कैप्सूल चंद्रमा के पीछे से गुजरेगा, तो रेडियो और लेजर सिग्नल ब्लॉक हो जाएंगे। चंद्रमा की विशाल दीवार पृथ्वी और अंतरिक्ष यान के बीच आ जाएगी। लगभग 40 मिनट तक ये चारों अंतरिक्ष यात्री ब्रह्मांड के उस गहरे अंधेरे में पूरी तरह अकेले होंगे।
विक्टर ग्लोवर की अपील: ‘एक साथ आएं’ मिशन के पायलट विक्टर ग्लोवर ने इस अकेलेपन को एक अवसर के रूप में देखने की बात कही है। उन्होंने साझा किया:
“जब हम चंद्रमा के पीछे होंगे और दुनिया से हमारा संपर्क टूट जाएगा, तो इसे एक मौके की तरह लें। हमारे लिए प्रार्थना करें और अच्छी भावनाएं भेजें ताकि हम सुरक्षित वापस संपर्क में आ सकें।”
इतिहास खुद को दोहरा रहा है यह पहली बार नहीं है जब इंसान ने इस खामोशी को महसूस किया है। 50 साल पहले अपोलो 11 के माइकल कोलिन्स ने भी ऐसा ही अनुभव किया था। जब नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन चांद की सतह पर कदम रख रहे थे, तब कोलिन्स चंद्रमा की कक्षा में अकेले थे। उन्होंने अपनी यादों में लिखा था कि उन्हें डर तो नहीं लगा, लेकिन वह अनुभव ‘पूर्ण अलगाव’ (Truly Alone) जैसा था।
डिस्कवर इनसाइट्स: डिस्कनेक्ट होने के दौरान क्या करेंगे अंतरिक्ष यात्री? संपर्क टूटने का मतलब यह नहीं है कि काम रुक जाएगा। यह समय वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है:
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चंद्रमा का अवलोकन: यात्री चंद्रमा की भूविज्ञान (Geology) का अध्ययन करेंगे।
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फोटोग्राफी: वे चंद्रमा के उस हिस्से की हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेंगे जो पृथ्वी से कभी नहीं दिखता।
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डेटा कलेक्शन: ओरियन कैप्सूल के सेंसर डेटा रिकॉर्ड करते रहेंगे जिसे संपर्क बहाल होने पर पृथ्वी पर भेजा जाएगा।
भविष्य की तैयारी: अब सन्नाटा नहीं रहेगा? कॉर्नवाल के ‘गूनहिली अर्थ स्टेशन’ सहित दुनिया भर की एजेंसियां इस पर नजर रख रही हैं। नासा का लक्ष्य है कि भविष्य में चांद पर बेस बनाने के लिए 24 घंटे का संपर्क अनिवार्य हो। इसके लिए ‘यूरोपियन स्पेस एजेंसी’ (ESA) Moonlight जैसे प्रोग्राम पर काम कर रही है, जो चांद के चारों ओर उपग्रहों का एक नेटवर्क बनाएगा ताकि भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों को कभी ऐसा ‘ब्लैकआउट’ न झेलना पड़े।
