आखिर कौन था वो शख्स, जिसे बुद्ध और महावीर दोनों ने अपना सबसे बड़ा ‘वैचारिक दुश्मन’ माना?

भारतीय इतिहास के छठे शताब्दी ईसा पूर्व को ‘दार्शनिक विस्फोट’ का युग कहा जाता है। एक तरफ गौतम बुद्ध ‘मध्यम मार्ग’ की बात कर रहे थे, तो दूसरी तरफ भगवान महावीर ‘कर्म और तप’ पर जोर दे रहे थे। लेकिन इन्हीं के बीच एक ऐसा विचारक था जिसने पूरी दुनिया को एक मशीन करार दे दिया। उसका नाम था— मक्खली गोशाल

कौन थे मक्खली गोशाल?

मक्खली गोशाल का जन्म एक गौशाला में हुआ था। उन्होंने 6 साल तक महावीर के साथ कठिन तपस्या की, लेकिन बाद में एक ‘तिल के पौधे’ के उदाहरण पर दोनों के रास्ते अलग हो गए। गोशाल ने ‘आजीविक संप्रदाय’ की स्थापना की, जिसका मूल मंत्र था— नियति (Fate)

नियतिवाद: “सब कुछ पहले से तय है”

गोशाल का दर्शन बुद्ध और महावीर के लिए ‘खतरनाक’ क्यों था? इसकी वजह थी गोशाल का यह मानना कि इंसान की मेहनत (Free Will) का कोई मूल्य नहीं है।

  • धागे की गेंद का उदाहरण: गोशाल कहते थे कि जैसे धागे की एक गेंद फेंकने पर वह उतना ही खुलती है जितना उसमें धागा है, वैसे ही इंसान का जीवन भी पहले से तय रास्ते पर चलता है।

  • अकाउंटेबिलिटी का अंत: यदि सब कुछ तय है, तो न कोई पाप है, न पुण्य। यही कारण था कि बुद्ध ने इसे ‘बालों की चटाई’ जैसा कष्टदायक दर्शन बताया, जो समाज में आलस्य फैला सकता था।

क्या आज भी जिंदा है यह सोच?

भले ही 14वीं शताब्दी तक आजीविक संप्रदाय कागजों से लुप्त हो गया, लेकिन आज भी हमारी बोलचाल में यह जिंदा है।

  • जब हम कहते हैं, “जो लिखा है वही होगा” या “किस्मत का खेल है”, तो हम अनजाने में मक्खली गोशाल की भाषा बोल रहे होते हैं।

  • आधुनिक विज्ञान: आज का ‘हार्ड डिटरमिनिज्म’ (Hard Determinism) और न्यूरोसाइंस भी यही सवाल उठाते हैं कि क्या हमारे फैसले हमारे न्यूरॉन्स और पिछले अनुभवों से पहले ही तय नहीं हो जाते?

अशोक और आजीविक संप्रदाय

यह संप्रदाय इतना प्रभावशाली था कि महान सम्राट अशोक और उनके पोते दशरथ ने बिहार की बाराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों में आजीविकों के लिए गुफाएं दान की थीं। इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में इस दर्शन को मानने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग मौजूद था।


निष्कर्ष: सांत्वना या बहाना?

नियतिवाद हमें असफलता के समय सांत्वना तो देता है (कि यह मेरी गलती नहीं थी, किस्मत थी), लेकिन यह कर्म करने की प्रेरणा को भी खत्म कर सकता है। मक्खली गोशाल का दर्शन हमें आज भी यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपनी मर्जी के मालिक हैं या सिर्फ ब्रह्मांड की मशीन के छोटे से पुर्जे?

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