कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बीच एक नाटकीय घटनाक्रम में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने हुमायूं कबीर की अगुवाई वाली पार्टी के साथ अपना गठबंधन तोड़ लिया है। नामांकन प्रक्रिया के बीच आए इस फैसले ने राज्य की सियासी सरगर्मी को तेज कर दिया है। AIMIM ने अब बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।
विवाद की जड़: क्या है वायरल वीडियो का सच?
यह पूरा विवाद हुमायूं कबीर के एक कथित ‘स्टिंग’ वीडियो के सामने आने के बाद शुरू हुआ। तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा जारी किए गए इस वीडियो में कबीर को कथित तौर पर यह कहते सुना गया कि वह भाजपा नेताओं के संपर्क में थे और टीएमसी को हराने के लिए ‘1,000 करोड़ रुपये’ की डील हुई थी।
हालांकि, भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे टीएमसी की ‘चुनावी नौटंकी’ करार दिया है। हुमायूं कबीर की ओर से भी इस वीडियो की सत्यता को लेकर स्पष्टीकरण आना बाकी है।
गठबंधन टूटने के 3 मुख्य कारण:
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मुस्लिम मतदाताओं में अविश्वास: AIMIM ने ट्वीट कर कहा कि वे ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं कर सकते जिससे समुदाय की ईमानदारी पर सवाल उठे।
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छवि बचाने की कोशिश: कबीर पर ‘बीजेपी की बी-टीम’ होने के आरोप लगने के बाद ओवैसी अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहते हैं।
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रणनीतिक बदलाव: अब मजलिस (AIMIM) हाशिए पर पड़े समुदायों की अपनी स्वतंत्र आवाज बुलंद करने की नीति पर काम करेगी।
बंगाल की राजनीति पर इसका क्या असर होगा?
पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से करीब 112 से 130 सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।
| क्षेत्र/जिला | मुस्लिम आबादी का प्रभाव | राजनीतिक स्थिति |
| मालदा & मुर्शिदाबाद | 50% से अधिक | निर्णायक प्रभाव |
| उत्तर दिनाजपुर | 30% से अधिक | चुनावी रुख बदलने की क्षमता |
| कुल निर्णायक सीटें | 100+ सीटें | सरकार बनाने में अहम |
विशेषज्ञों की राय: जानकारों का मानना है कि हुमायूं कबीर और ओवैसी के अलग होने का सीधा फायदा तृणमूल कांग्रेस (TMC) को मिल सकता है। कबीर की सभाओं में उमड़ रही भीड़ ने टीएमसी को चिंता में डाल दिया था, लेकिन अब गठबंधन टूटने से वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना कम हो गई है।
