भारत में आधार कार्ड अब सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि हर नागरिक की डिजिटल पहचान बन चुका है। लेकिन, इसकी सुलभता को लेकर अब देश की सर्वोच्च अदालत में एक नई बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर मांग की गई है कि नया आधार कार्ड जारी करने के नियमों में बड़े बदलाव किए जाएं।
क्या है याचिका की मुख्य मांग?
प्रसिद्ध वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य रूप से दो बातें कही गई हैं:
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उम्र सीमा: नया आधार कार्ड केवल 6 साल तक के बच्चों के लिए ही आसानी से जारी होना चाहिए।
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कठोर सत्यापन: यदि कोई वयस्क (Adult) या किशोर नया आधार कार्ड बनवाना चाहता है, तो उसका वेरिफिकेशन साधारण स्तर पर न होकर एसडीएम (SDM) या तहसीलदार जैसे उच्च अधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए।
क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत?
याचिकाकर्ता का तर्क है कि वर्तमान प्रणाली का फायदा उठाकर विदेशी घुसपैठिये अवैध तरीके से आधार कार्ड बनवा रहे हैं।
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सुरक्षा को खतरा: आधार के जरिए घुसपैठिये राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज हासिल कर लेते हैं, जिससे देश की सुरक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया (चुनाव) प्रभावित होती है।
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नागरिकता का भ्रम: याचिका में स्पष्ट करने को कहा गया है कि आधार केंद्रों पर बड़े बोर्ड लगाए जाएं, जो यह बताएं कि आधार ‘पहचान का प्रमाण’ है, न कि ‘नागरिकता’ या ‘जन्म तिथि’ का।
आम नागरिक पर क्या होगा असर?
देश में अब तक 144 करोड़ से अधिक आधार कार्ड जारी किए जा चुके हैं। याचिका के अनुसार, चूंकि लगभग सभी वास्तविक नागरिकों के पास आधार पहले से मौजूद है, इसलिए नए नियमों से आम जनता को परेशानी नहीं होगी। यह कदम केवल उन मामलों के लिए है जहाँ नए कार्ड के लिए आवेदन किया जा रहा है।
अदालत से अन्य महत्वपूर्ण मांगें:
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कड़ी सजा का प्रावधान: फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आधार बनवाने वालों और इसमें मदद करने वालों के लिए सख्त सजा तय हो।
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अधिकारियों की जवाबदेही: नए आधार कार्ड के सत्यापन की जिम्मेदारी बड़े प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपी जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
इस याचिका में UIDAI के साथ-साथ गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया गया है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या रुख अपनाता है।
