भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 16 अप्रैल की तारीख एक नई इबारत लिखने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर को समानता और समावेशन के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कुछ निर्णय अपने समय की सीमा को लांघकर आने वाली पीढ़ियों का भाग्य तय करते हैं।
त्योहारों के बीच लोकतंत्र का नया सवेरा
यह विशेष सत्र ऐसे समय में हो रहा है जब पूरा देश उत्सव के माहौल में है। उत्तर में बैसाखी, असम में बिहू, केरल में विषु और तमिलनाडु में पुथांडू जैसे पर्व नई ऊर्जा का संचार कर रहे हैं। इसी दौरान महात्मा फुले की 200वीं जयंती और बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती भी है, जो सामाजिक न्याय के मूल्यों को और मजबूती प्रदान करती है।
महिला आरक्षण: अब और इंतज़ार क्यों नहीं?
पीएम मोदी ने जोर देकर कहा कि राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है। अंतरिक्ष से लेकर सशस्त्र बलों तक, बेटियां हर जगह मिसाल कायम कर रही हैं।
लेख के प्रमुख बिंदु:
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प्रतिनिधित्व की कमी: पिछले कई दशकों के प्रयासों के बावजूद, विधायी संस्थाओं में महिलाओं की संख्या उनकी आबादी के अनुरूप नहीं रही है।
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प्रशासनिक अनुभव: जब महिलाएं प्रशासनिक निर्णय लेती हैं, तो शासन में संवेदनशीलता और जवाबदेही बढ़ती है।
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ऐतिहासिक कदम: सितंबर 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को अब जमीन पर उतारने का समय है।
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2029 का लक्ष्य: सरकार की योजना है कि 2029 के लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण के प्रावधानों के साथ संपन्न हों।
सभी राजनीतिक दलों से अपील
प्रधानमंत्री ने इसे किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का विषय बताया है। उन्होंने सभी सांसदों से आग्रह किया है कि वे इस ऐतिहासिक सत्र में एकजुट होकर महिला आरक्षण का समर्थन करें। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र की असली ताकत खुद को समय के साथ अधिक समावेशी बनाने में है।”
