दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की चमक के पीछे, उसकी पार्किंग में एक और इतिहास रचा जा रहा है। यह इतिहास किसी राजा-महाराजा का नहीं, बल्कि उन बच्चों का है जिनके हाथों में कभी कूड़ा या मजदूरी के औजार हुआ करते थे। आज उनके हाथों में कलम है, और इसका श्रेय जाता है दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल थान सिंह को।
2015 में 5 बच्चों से हुई थी शुरुआत थान सिंह बताते हैं कि 2015 में उन्होंने इस पाठशाला की शुरुआत महज 5 बच्चों के साथ की थी। आज यहाँ पहली से दसवीं कक्षा तक के 100 से अधिक बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। ये बच्चे उन परिवारों से आते हैं जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं—कोई रिक्शा चलाने वाले का बच्चा है, तो कोई माली या मजदूर का।
पाठशाला की मुख्य विशेषताएँ:
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सिर्फ पढ़ाई नहीं, जीवन का सुधार: यहाँ बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं दिया जाता, बल्कि उनके रहने, खाने (लंगर की व्यवस्था) और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाता है।
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अनुभवी वॉलंटियर्स: दिल्ली यूनिवर्सिटी और विभिन्न कॉलेजों की छात्राएं यहाँ आकर बच्चों को पढ़ाती हैं।
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तकनीकी शिक्षा: पाठशाला में कंप्यूटर की सुविधा भी उपलब्ध है, ताकि बच्चे डिजिटल दुनिया से पीछे न रहें।
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ई-रिक्शा की सुविधा: दूर से आने वाले बच्चों के लिए थान सिंह ने ई-रिक्शा का इंतजाम किया है ताकि उनकी पढ़ाई में दूरी बाधा न बने।
जब ब्लास्ट के दौरान कांप गया था कलेजा लेख में थान सिंह ने एक भावुक किस्सा साझा किया। 10 नवंबर को जब इलाके में धमाका हुआ, तो थान सिंह लोगों की जान बचाने में जुटे थे। लेकिन जैसे ही खबर मिली कि उनकी पाठशाला के दो बच्चे गायब हैं, उनका दिमाग सुन्न हो गया। बाद में पता चला कि वे बच्चे डर के मारे पाठशाला के अंदर ही सो गए थे। थान सिंह कहते हैं, “मैं अब खुद के लिए नहीं, इन बच्चों के लिए जी रहा हूँ।”
बदल रही है पीढ़ियाँ आज यहाँ पढ़ने वाले बच्चों के सपने बड़े हैं। कोई पुलिस ऑफिसर बनना चाहता है तो कोई डॉक्टर। 85% अंक लाने वाले छात्र अजय जैसे उदाहरण बताते हैं कि अगर सही मार्गदर्शन मिले, तो प्रतिभा किसी भी झुग्गी-झोपड़ी से निकलकर चमक सकती है।
