रामलीला मैदान में उमड़ा ‘मास्टरों’ का सैलाब
भारत के शिक्षा इतिहास में संभवतः यह पहला मौका है जब रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके शिक्षक अपनी डिग्री और नौकरी बचाने के लिए सड़कों पर हैं। शनिवार को दिल्ली का रामलीला मैदान हजारों शिक्षकों के नारों से गूंज उठा। Teachers Federation of India के नेतृत्व में जुटे इन शिक्षकों की केवल एक ही मांग है: “पुराने शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से मुक्त रखा जाए।”
विवाद की जड़: क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
1 सितंबर 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए सुरक्षा कवच हटा दिया है।
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अनिवार्यता: कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) कानून की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सभी कार्यरत शिक्षकों का TET पास होना जरूरी है।
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डेडलाइन: सरकार को आदेश दिया गया है कि वे ऐसे शिक्षकों को 2 साल का समय दें। यदि इस अवधि में परीक्षा पास नहीं होती, तो उनकी सेवाएं समाप्त मानी जाएंगी।
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दायरा: इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश के 2 लाख और पूरे भारत के लगभग 20 लाख शिक्षकों पर पड़ेगा।
शिक्षकों का तर्क: “खेल शुरू होने के बाद नियम नहीं बदले जाते”
आंदोलनकारी शिक्षकों का कहना है कि जब उनकी भर्ती (2011 से पहले) हुई थी, तब पात्रता के नियम अलग थे। 50 से 58 वर्ष की आयु के शिक्षकों के लिए अब गणित, विज्ञान और तर्कशक्ति की प्रतियोगी परीक्षा देना लगभग असंभव जैसा है।
“मेरे बच्चों के भी बच्चे हो गए हैं, अब इस उम्र में मुझसे परीक्षा देने को कहा जा रहा है। क्या सालों का हमारा अनुभव शून्य है?” — अनीता देवी, प्रदर्शनकारी शिक्षिका
विशेषज्ञों की राय और समाधान की राह
शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार को इस मामले में ‘अध्यादेश’ (Ordinance) लाना चाहिए। उनका सुझाव है कि परीक्षा के बजाय अनुभवी शिक्षकों के लिए ‘इन-सर्विस ट्रेनिंग’ या ‘रिफ्रेशर कोर्स’ आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे नई शिक्षा नीति (NEP) के साथ तालमेल बिठा सकें।
सांसद जगदंबिका पाल ने भी इस मुद्दे पर सहानुभूति जताते हुए इसे प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री के समक्ष उठाने का आश्वासन दिया है।
